September 26, 2021

यूपी चुनाव 2022: राजा महेंद्र के सहारे सियासी समीकरण भी साधते दिखे मोदी-योगी, जाटलैंड की सौ सीटों पर नजर


विश्वविद्यालय का मॉडल देखते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
– फोटो : ANI

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प्रतीकों के सहारे सियासी समीकरणों को परवान चढ़ाने और राजनीतिक बिसात को अपने मन-मुताबिक बिछाने में माहिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को अलीगढ़ में इसी राह पर आगे बढ़ते नजर आए। लंबे समय से कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन और इसकी वजह से सियासी समीकरणों को प्रभावित करने वाले जाटों की नाराजगी की चर्चाओं के बीच उन्होंने अलीगढ़ में महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्रांतिकारी राजा महेंद्र प्रताप सिंह की स्मृति में बनने वाले राज्य विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया। साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटलैंड की लगभग सौ सीटों के समीकरणों को भी दुरुस्त करने की कोशिश की।

इसके लिए प्रदेश सरकार को श्रेय देते हुए उन्होंने यह संदेश देने की भी कोशिश की कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री होने के कारण ही यह संभव हुआ। मोदी और योगी ने राजा महेंद्र प्रताप के प्रतीक के सहारे एक तरफ  जाटलैंड को समझाने का प्रयास किया कि भाजपा ही उनके सरोकारों के सम्मान, स्वाभिमान और संवेदनाओं का ध्यान रख रही है। साथ ही इस इलाके के लोगों को ही नहीं बल्कि प्रदेश और देश भर के लोगों के दिमाग में यह बैठाने का प्रयत्न किया कि उनकी सरकार से पहले की सरकारों ने निहित स्वार्थ, तुष्टीकरण, वोटों की गणित के चलते देश के उन महापुरुषों को परदे के पीछे धकेल दिया जो उनकी तुष्टीकरण की नीति के आड़े आते थे।

राजा महेंद्र प्रताप का महत्व
दरअसल, राजा महेंद्र प्रताप सिंह वह शख्सियत थे जिन्होंने 35 साल निर्वासित जीवन बिताते हुए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। 1915 में पहली निर्वासित सरकार बनाकर अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती दी थी। निर्वासित सरकार के वे राष्ट्रपति बने थे जबकि बरकत उल्ला खां उनके प्रधानमंत्री। जाट रियासत में जन्म लेने वाले राजा महेंद्र प्रताप ने सिर्फ  आजादी की लड़ाई ही नहीं लड़ी बल्कि सामाजिक और शैक्षिक सुधारों के लिए भी काफी काम किया। राजधानी लखनऊ के पूर्व महापौर दिवंगत डॉ. दाऊ जी गुप्त ने एक बार बताया था कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह बड़े दार्शनिक और दूरदर्शी थे। उन्होंने धर्म व संस्कृति के बीच एक नई धारा ‘प्रेम धर्म’ की स्थापना की थी।

यही नहीं, उन्होंने 1909 में कौशल विकास की जरूरत महसूस करते हुए वृंदावन में देश की पहली पॉलीटेक्निक की स्थापना करने के साथ ‘वर्ल्ड फेडरेशन’ बनाकर दुनिया के देशों के बीच समन्वय की जरूरत बताई थी। महात्मा गांधी तक उनका सम्मान करते थे । डॉ. गुप्त ने बताया था कि जाट परिवार से होने और अद्भुत ऐतिहासिक कार्य करने के नाते वे जाटों के ‘ऑइकान’ बन गए।

प्रदेश में जाट आबादी लगभग 6 प्रतिशत है। पर, पश्चिम के मथुरा जैसे कई जिलों में इनकी आबादी का प्रतिशत 24 तक है। इसकी वजह से लोकसभा और विधानसभा की सीटों पर जाट वोट निर्णायक हो जाता है। जाटों के बीच राजा महेंद्र प्रताप सिंह से भावनात्मक लगाव को सिर्फ  इसी से जाना जा सकता है कि उन्हें सर्व सम्मति से अखिल भारतीय जाट महासभा का अध्यक्ष चुना  गया था।

उनकी लोकप्रियता का एक उदाहरण 1957 का लोकसभा चुनाव है जब उन्होंने मथुरा में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार अपने खिलाफ  चुनाव लड़ रहे हर व्यक्ति की जमानत जब्त करा दी थी। उनसे पराजित होने वालों में अटल बिहारी वाजपेयी भी थे। जाहिर है कि मोदी ने अलीगढ़ में पूर्ववर्ती सरकारों पर महापुरुषों को भुला देने और 20वीं सदीं की गलतियों को 21वीं सदीं में दुरुस्त करने के बहाने जाटों को यह संदेश देने की कोशिश की उनके सरोकारों व भावनाओं का सम्मान भाजपा की सरकारें ही कर सकती हैं।

वायदों पर अमल का इरादा
यही नहीं, अलीगढ़ के जरिये प्रधानमंत्री ने यह भी संदेश दिया कि केंद्र और प्रदेश की योगी सरकार सिर्फ  वादा नहीं करती बल्कि उन्हें पूरा करती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2019 में अलीगढ़ दौरे के दौरान राजा महेंद्र प्रताप सिंह की अनदेखी को मुद्दा बनाते हुए उनके नाम पर एक विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा की थी। उन्होंने यह घोषणा चुनावी परिदृश्य के मद्देनजर जाटों की नाराजगी दूर करने के लिए ही की थी लेकिन इसके पीछे कहीं न कहीं हिंदुत्व का मुद्दा भी छिपा था।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के निर्माण में राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने भी काफी योगदान दिया था। उन्होंने इस विश्वविद्यालय को जमीन भी दी थी। भाजपा कार्यकर्ता काफी समय से एएमयू में उनके योगदान का उल्लेख लिखने और विश्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर करने की मांग कर रहे थे। साथ ही एएमयू पर योगदान की अनदेखी करने का आरोप लगा रहे थे।

जिन्ना की तस्वीरों को लेकर राजनीतिक सुर्खियों में चल रहे एएमयू पर भाजपा के हमलों के बीच राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर विश्वविद्यालय का शिलान्यास करके भाजपा सरकार ने संकेतों में ही सही लेकिन हिंदुत्व के समीकरणों पर भी सियासी गणित साधने का संकेत दिया है। इसका कुछ न कुछ लाभ भाजपा को जरूर मिलेगा। महाराजा सूरजमल इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष इंजीनियर कप्तान सिंह कहते भी हैं, ‘कम से कम राजा महेंद्र प्रताप सिंह के योगदान को कुछ तो पहचान मिली। वैसे हम लोग (जाट समाज) तो उन्हें भारतरत्न की सरकार से मांग कर रहे हैं।’

इनके भी हैं मायने
प्रधानमंत्री ने अलीगढ़ से सिर्फ  जाटों को सियासी संदेश देने की कोशिश नहीं की बल्कि भाषण के  शुरुआत में ही कल्याण सिंह का नाम लेकर पिछड़ों को भी राजनीतिक संदेश दिया, कि भाजपा के लिए कल्याण कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। साथ ही राजा महेंद्र प्रताप सिंह और कल्याण के जरिये पश्चिम के किसानों को भी साधने की कोशिश की। तभी तो उन्होंने अलीगढ़ में न सिर्फ  किसानों के लिए किए जा रहे काम गिनाए बल्कि अलीगढ़ के योगदान को घरों की सुरक्षा से अब सीमाओं की रक्षा तक बढ़ाने की बात कहते हुए पश्चिम के किसानों को यह बताने का प्रयास किया कि वे उनके सरोकार, सम्मान, स्वाभिमान का ही नहीं बल्कि उनके घरों के नौजवानों के रोजगार का भी इंतजाम कर रहे हैं।

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प्रतीकों के सहारे सियासी समीकरणों को परवान चढ़ाने और राजनीतिक बिसात को अपने मन-मुताबिक बिछाने में माहिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को अलीगढ़ में इसी राह पर आगे बढ़ते नजर आए। लंबे समय से कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन और इसकी वजह से सियासी समीकरणों को प्रभावित करने वाले जाटों की नाराजगी की चर्चाओं के बीच उन्होंने अलीगढ़ में महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्रांतिकारी राजा महेंद्र प्रताप सिंह की स्मृति में बनने वाले राज्य विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया। साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटलैंड की लगभग सौ सीटों के समीकरणों को भी दुरुस्त करने की कोशिश की।

इसके लिए प्रदेश सरकार को श्रेय देते हुए उन्होंने यह संदेश देने की भी कोशिश की कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री होने के कारण ही यह संभव हुआ। मोदी और योगी ने राजा महेंद्र प्रताप के प्रतीक के सहारे एक तरफ  जाटलैंड को समझाने का प्रयास किया कि भाजपा ही उनके सरोकारों के सम्मान, स्वाभिमान और संवेदनाओं का ध्यान रख रही है। साथ ही इस इलाके के लोगों को ही नहीं बल्कि प्रदेश और देश भर के लोगों के दिमाग में यह बैठाने का प्रयत्न किया कि उनकी सरकार से पहले की सरकारों ने निहित स्वार्थ, तुष्टीकरण, वोटों की गणित के चलते देश के उन महापुरुषों को परदे के पीछे धकेल दिया जो उनकी तुष्टीकरण की नीति के आड़े आते थे।

राजा महेंद्र प्रताप का महत्व

दरअसल, राजा महेंद्र प्रताप सिंह वह शख्सियत थे जिन्होंने 35 साल निर्वासित जीवन बिताते हुए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। 1915 में पहली निर्वासित सरकार बनाकर अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती दी थी। निर्वासित सरकार के वे राष्ट्रपति बने थे जबकि बरकत उल्ला खां उनके प्रधानमंत्री। जाट रियासत में जन्म लेने वाले राजा महेंद्र प्रताप ने सिर्फ  आजादी की लड़ाई ही नहीं लड़ी बल्कि सामाजिक और शैक्षिक सुधारों के लिए भी काफी काम किया। राजधानी लखनऊ के पूर्व महापौर दिवंगत डॉ. दाऊ जी गुप्त ने एक बार बताया था कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह बड़े दार्शनिक और दूरदर्शी थे। उन्होंने धर्म व संस्कृति के बीच एक नई धारा ‘प्रेम धर्म’ की स्थापना की थी।

यही नहीं, उन्होंने 1909 में कौशल विकास की जरूरत महसूस करते हुए वृंदावन में देश की पहली पॉलीटेक्निक की स्थापना करने के साथ ‘वर्ल्ड फेडरेशन’ बनाकर दुनिया के देशों के बीच समन्वय की जरूरत बताई थी। महात्मा गांधी तक उनका सम्मान करते थे । डॉ. गुप्त ने बताया था कि जाट परिवार से होने और अद्भुत ऐतिहासिक कार्य करने के नाते वे जाटों के ‘ऑइकान’ बन गए।


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